जिन्दगी एक कहानी है। आगे की राह लिखने वाला, जिन्दगी के हर पहलू को बहुत ही सोच समझ कर आगे बढ़ाता है। हर कदम हर पंक्ति परिस्थितियों पर निर्भर होती हैं। लिखने वाला अपने किरदार की अभिव्यक्ति व व्यवहार पर आगे की कहानी को आगे बढ़ाता है, जो पृथ्वी पर उसकी कृतियों को देख, अपनी कृतियों को एक रूप एवं वर्णन दें, कहानी को आगे बढ़ाता है। प्रकृति ही जीवन की सीख है, क्योंकि कहानीकार की प्रेरणा भी वही है। व्यक्ति बढ़ता है, सरल नदी की तरह, उम्र के साथ बहाव तेज होता है, अपनी निर्मलता और आवश्यकतानुसार मनुष्य की प्यास बुझा, उसे शांत चित्त करता है। वेग बढ़ता है तब तांडव भी हो सकता है। मनुष्य का घमंड एवं आसमान छूने की चाह, नदी की बाढ़, ताण्डव दिखा शान्त करने की कोशिश करती है। समझदार अपने को अंतर्मन से झकझोर कर, चपेट से अलग हो, ईश्वर को याद कर, कहानी में जोड़ देता है। नासमझ, ताण्डव के नृत्य में झूम, जमीनी हकीकत समझ विनाश के रूपों का सामना करता है।
नदी बहुत बड़ी शिक्षक है। कहानीकार ने उसके कई रूप बना, कई उद्देश्यों एवं क्षमताओं के साथ पृथ्वी पर रखा है, और यहीं से अपनी कई कहानियों के विषय चुन, विश्व के इस मंच पर हर व्यक्ति की जिन्दगी को सुपरहिट से फ्लाप में बदलते रहता है। रास्ते के पत्थरों को अपनी साइड में कर चिकना बनाता रहता है। अपने किरदार को एक शिक्षा देकर भी, रफ और टफ छोड़, तमाम सांसारिक परिस्थितियों को झेल, लड़ो पर, अपनी उच्चतम क्षमता को परिस्थितियों के साथ मेल कर, अलग हो जाओ। समय के साथ चलो, प्रकृति के नियमों का पालन कर व्यवहार को चिकना बनाओ, और दृढ़ता जो आपके ही अंदर है बढ़ा, हंसते हुए बढ़ो, और कहानीकार की कहानी मैं एक सुखद वाक्या होगा, सभी को खुशी और हंसी भी देगा। यह एक शिक्षा (स्म्ैैव्छ) होगी, सभी के लिए, एक सही, सफल, उपयोगी एवं सामाजिक हितों की रक्षा की।
नदी के रूप हर दिन, हर समय बदलते रहते हैं। पहाड़ों को फाड़कर भी अपना रास्ता बना लेती है। कहानीकार भी यही दृश्य अपनी इस सांसारिक के अनगिनत शो में बड़े से बडे़ विलेन का नाश – एक सही मार्गदर्शक के साथ व्यक्तियों के समूह के वेग से करता है। नदी रास्ता बना, शीतलता से बढ़ जाती है। पहाडों के काटने के बाद अगर नदी को नीचे पठार नजर आता है तब वेग से गिरकर झरना बना अपनी शक्ति का एक अलग रूप दिखाती है।
कहानीकार को एक तीसरा किरदार और एक नई कहानी की रूपरेखा दिखती है, एक और सीख देने के लिऐ। परिस्थितिवश कठिनाइयों में झुक कर, निर्मल मन व शरीर से कूद जाइये लड़ने। विश्वास अडिग हो, दूसरों का साथ हो और दृढ़ संकल्प हो तो ऊँचाई से नीचे की राह भी, आसन हो जाती है। तब, वेग भी ज्यादा और उद्देश्य भी ज्यादा और आपके सभी साथियों के साथ सभी को आशा, दिशा और सफलता। इस किरदार के अदाकार को बहुत सक्षम होकर, अपनी एक्टिंग में बहुत ही तरह के भावों को सच्चाई से अपने हाथ व माथे में डाल, उस किरदार को जीवन्त बना सक्षमता और योग्यता के शिखर को हासिल कर, एक अमर कृति को यादगार बना देता है। कहानीकार को भी बहुत संयम और सही संचालन, एवं निर्देशन कर कलाकार से अच्छा से अच्छा जीवन्त कार्य की क्षमता को जीवंत कर, किरदार को भी एक ऊँचाई प्रदान कराता है। यही जिन्दगी में भी हो रहा है। देखिये आसपास आपने कहानीकार को कितनी मुसीबत में डाल कर रखा है। लेकिन आपको नहीं मालूम, इस अमर-कृति के आगे क्या है। एक ही शिक्षा है किरदार के हर अच्छे पहलू को समझ अपनी असली जिन्दगी का हिस्सा बना दूसरों के लिए शिक्षा का माध्यम बने।
नदी के साथ हरियाली है। पेड़ हैं, पौधे हैं, फूल हैं, अनाज है, बाली है। सभी मिल इस पृथ्वी को हरा-भरा बना, इस मनुष्य को रहने के सभी साधन देते हैं। तरह-तरह के पक्षियों का रहवास भी यह है। पेड़, पौधे ही इनके घर है एवं आहार भी। कई पक्षियों का भोजन भी अलग होता है और उसका निदान भी अलग-अलग होता है। कई जानवरों के भी अलग-अलग आहार होते हैं एवं उसी तरह ईश्वर ने संरचना कर पूर्ति की है। यहाँ एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा किया है ैन्त्टप्ट।स् व्थ् ज्भ्म् थ्प्ज्ज्म्ैज् ताकतवर ही जिन्दा रहता है। मैं इसे दूसरी तरह से समझकर लिख रहा हूँ – ताकतवर, या अन्य को ताकत भी ईश्वर ने दी है। और समझ कर ही दी है। तब यह प्रकृति का ही नियम है और इसीलिए प्रकृति ने ही इन्हें समूहों में बांट कर धरती के अलग-अलग हिस्सों में रखा है। यह बात अलग है कि कई कारणों से इन जानवरों को उनकी विषमता एवं आवश्यकतानुसार, संसार में जगह-जगह इनके लिए संरक्षित स्थानों का निर्माण कर, इन प्रजातियों के अस्तित्व को बचाने की कोशिश की जा रही है। मनुष्य को ईश्वर के नियमों का उल्लंघन कर अपनी जिन्दगी को नासमझ तरीके से समझ और उसकी व्याख्या कर, पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी का अहसास हुआ है। करीब 25 सालों पहले पर्यावरण की सही परिभाषा को समझ, और अपना, यू.एन.ओ के अन्तर्गत सभी देश, इसमें साथ देकर इस पृथ्वी को आने वाली विपदाओं से सम्हालने की कोशिश भी कर रहे हैं। यही उस कहानीकार की कथा है। पर्यावरण बचाओ और जिन्दगी का सही अहसास करो। इसका मूल नायक और खलनायक दोनों ही – जानवर एवं पक्षी है। इनके भी अपने-अपने नियम है। भोजन व पानी, दोनों ही परम आवश्यक है। रहवास पानी वाली जगह जहाँ उनके खाने लायक जानवर हो, वह जानवर जो दया पर है, अपनी जिन्दगी झुण्ड में बिताकर, सामूहिक जीवन के हर नियम का पालन कर, एक दूसरे की सहायता करता रहता है। समय होेने पर बचने की पूरी कोशिश करता है और उनका झुण्ड उसकी मदद उनकी क्षमतानुसार करता है। लेकिन अन्त मंे उसे मालूम है, उसे समझौता कर आगे बढ़ना है।
ताकतवर जानवर उतने ही जानवर मारता है जो उसके व उसके परिवार के लिए आवश्यक होते हैं। या उसकी ही प्रजाति के भूखे जानवर, अगर लड़ते हैं तो वे उससे लड़ते हैं, अपने भोजन को बचाने के लिये या भाग जाते हैं ताकत के आगे। कभी दो या तीन बड़े जानवर कमजोर जानवरों पर एक साथ भी आक्रमण करते हैं, और समझ बूझ कर इस तरह का जाल बिछाते हैं कि उनका कार्य पूरा हो। यहाँ भी लेखक – इसे भी रोचक बना, दोनों जानवरों की दास्तां बता, सह अस्तित्व का महत्व समझाता है। क्या उनकी संरचना की बारीकियों को, इस विश्वरूपी मंच पर, मनुष्य को उसका भागीदारी बना सकता है। शायद नहीं। वह लेखक का हर किरदार व कहानी के हर पहलू बहुत खूबसूरती से लिखे गये हैं जहाँ, मनुष्य हो या जानवर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को समझ उसके निर्देशों का पालन कर, एक सफल, सुखद व अति मनोरंजक इस जिन्दगी रूपी फिल्म को रौचक बनाता रहता है।
यही कहानीकार के मूल भाव “सह-अस्तित्व“ का सार है। यह भाव मानव की दुनिया का एक अद्भुत मंत्र है जो हजारों साल से चला आ रहा है। साथ रहने का, आपसी समझ एवं संसाधनो के सामुहिक उपयोग का। एक दूसरे की मदद कर, आपदाओं से बचाने का और सभी के बल एवं बुद्धि से नई सोच एवं सामूहिक प्रयासों से नए-नए रास्ते खोज, जीवन की आवश्यकताओं को पूरा कर, प्रकृति के मान को बढ़ा उसे ईश्वर तुल्य समझ, नये-नये विचारों एवं समयानुसार आवश्यकताओं को पूरा कर जीवन को सरल बना अपने अस्तित्व की रक्षा कर समाज को उन्नत करना था। समाज बना, गाँव एवं शहर की संरचना हुई, और मनुष्य की आकांक्षाओं ने छलांग लगा, अपनी बुद्धि और ताकत से नये व फिर नये समाज की संरचना की और विधा के कई भागों में छिपे गुणों एवं उसके उपयोग से हर क्षेत्र में प्रगति की है।
कहानीकार के सपनों की दुनिया बढ़ती जाती है एवं उन्नति मनुष्य को हर क्षेत्र में नए आयाम हासिल हो, हर पहलू को उसकी इच्छानुसार प्रगति कर, आशाओं का महल एवं जगमगाती दुनिया को सजा आगे बढ़ता है। लेकिन मूल भाव जब बिखरने लगते हैं तब फिर – ष्ैन्त्टप्ट।स् व्थ् ज्भ्म् थ्प्ज्ज्म्ैज्ष्ए जो पाषाण युग का – एक जीने की व्याख्या थी, भौतिक उन्नति के साथ पुनः जागृत हो जाती है, यह मनुष्य-मनुष्य से आगे बढ़ने की होड़ में स्वंय प्रधान की धारणाओं से आगे बढ़ता है और खुद भी विनाश के कगार पर पहुँच जाता है। यह विश्व के सभी देश इस जटिलता के साथ, मनुष्य की आकांक्षाओ के साथ, देश की अस्मिता के नाम पर, कई कार्य ऐसे करने लगता जो मानवीय मूल्यों के खिलाफ है, और सभी, उसी रास्ते पर चल – अपने दूसरे उद्देश्य – ’’सह अस्तित्व“ को भूल, विनाश के रास्ते पर निकल पड़ता है।
कहानीकार विनाश की लीला को प्रस्तुत कर, समझाने की कोशिश करता है पर अन्त दुखद ही होता है। मनुष्य समय के साथ, अपनी बुद्धि विकास को नए प्रयोगों और व्याख्या से सर्वोच्च जगह बनाने की कोशिश कर मूल तत्व – ’’सह अस्तित्व’’ के मूल – ’’स्वयं-अस्तित्व“ के सिद्धांत कर इस कहानीकार के मूल सिद्धान्त को भूल, प्रकृति की ताकत को भूल, उसको भी झुटलाने की कोशिश करता है, लेकिन प्रकृति पर विजय पाना असंभव है, यह समझ देर से आती है। कहानीकार, इस छोटे से शब्द – स्वयं अस्तित्व की परिभाषा को समझा, सही मार्गदर्शन देता है, और इसी पर उसकी यह कहानी का आधार होता है। जो समझता है, – खुश रहता है और जो प्रकृति से भी खिलवाड़ करता है, नष्ट हो जाता है। इस धरती पर अच्छे से अच्छे, तरह-तरह के किरदार अपने-अपने क्षेत्रों में, मेहनत एवं बुद्धिमता से, मानवता को शिखर पर ले गए हैं, लेकिन कहीं न कहीं वह शिखर, प्रकृति की भावनाओं से मेल नहीं खाता है, और विकट परिस्थितियां, जटिलता के साथ, मनुष्य अस्तित्व पर भी चिन्ह लगा देती हैं। मानव उद्देश्य “सह अस्तित्व’’ एवं ’’समाज रचना“ के साथ सुखी जीवन को परिभाषित कर, इस धरती को स्वर्ग स्वरूप बना हंसी खुशी से दर्शित करता है। यहाँ ’’भौतिक आकांक्षा“ एवं ’’मानसिक कपटता“ को आध्यात्म एवं चिन्तन से, ’’सह अस्तित्व’’ की भावनाओं को उभार कर एक नए समाज की संरचना करता है। आज की स्थिति अगर हम भी हमारे देश, समाज व परिवार में देखंे तो सभी बढ़ रहे हैं लेकिन मनुष्य का हृास हो रहा है, वह गिर रहा है, शायद यही अन्त सफलता का है। सन्यास न लें, पर इसी जीवन शैली में रह सन्यास की भावनाओं को धारण कर मनुष्य को एक मंच, एक दरी पर लाया जा सकता है। समय ही सब सिखायेगा। समय बलवान होता है।
प्रकृति के अन्य रूप, पहाड़, हवा एवं आकाश को किरदार बना, इस लेख का दूसरा भाग शीघ्र ही आपके सामने प्रस्तुत करूंगा।
डॉ. सतीश शुक्ला
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