गुरू बिन भव निधि तरही न कोहूगुरू बिन भव निधि तरही न कोहू जिन्दगी के सागर को सफलतापूर्वक गुरू ही पार कराता है
डाॅ. सतीश शुक्लागुरू की परिभाषा गुरू के बिना उद्धार नहीं। बचपन में माँ गुरू स्वरूप होती है और उसके बाद पिता-बच्चे का साधक बन हर मोड़ पर गुरू का कार्य करता है। स्कूल में अध्यापक विषय की शिक्षा देता है और अपने आचरण, हावभाव, स्वभाव व वैचारिक बौधिकता से विद्यार्थी का जीवन संचय कर गुरू का स्वरूप पाते हैं। यहीं अध्यापक और गुरू में फर्क होता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है उसमें परिवर्तन आता है। शिक्षा में बदलाव आता है। इस बदलाव की सीमा में अगर अध्यापक, गुरू के रूप में विद्यार्थी को शिक्षा देता है जहाँ विषय उससे संबंधित पाठ्य विषय व बदलती मानसिकता व शारीरिक बदलाव को समझते हुए उसे एक सच्चा व्यक्ति बनने की प्रेरणा के साथ, जिन्दगी की जटिलता से साक्षात कर, उसके मन की तृष्णा को शांत करता है, तभी उसका अस्तित्व अध्यापक से गुरू के रूप में होता है। ज्ञान की परिभाषा असीमित है। किसी विषय को समझाकर, उसकी सही व्याख्या कर विद्यार्थी को विषय की समझ देना, उसके विषय ज्ञान को बढ़ावा दे, परीक्षा में सफल बनाना होता है। उस विषय ज्ञान के सही अर्थ को अपने में ढालना और उसके अनुसार आचरण करना एक गुरू ही बता सकता है।
गुरू के प्रकार गुरू, महागुरू, परमगुरू, ब्रह्मगुरू, गुरू घण्टाल
हर व्यक्ति में एक गुरू समाया होता है। उसे समझकर उसका रूप उजागर कर दूसरों के जीवन को संवारना, उसे गुरू की पंक्ति में खड़ा करता है। जब वह व्यक्ति, अपनी इस क्षमता को पहचान दूसरों का अग्रज हो सही रास्ता दिखाता, पर अपने आप पर नियंत्रण रख उसका अहसान नहीं बताता है और विद्यार्थी या व्यक्ति को सही रास्ते देख खुशी की अनुभूति करता है तभी वह गुरू का अधिकारी होता है। गुरू जब शिक्षा के दौरान विद्यार्थी के विषय के अलावा उसके भले को सोचते हुए, आगे के लिये सही मार्गदर्शन देता है और विद्यार्थी के अवगुणों को अनदेखा न कर उसे दंडित कर बौद्धिक दिशा पर वापस लाना अपना धर्म समझता है वह महागुरू हो जाता है। महागुरू का दण्ड भी विद्यार्थी का आशीर्वाद होता है और उसे लक्ष्य तक पहुँचाता है। विद्यार्थी का दुख ही महागुरू का दुख होता है पर उससे दुखी न हो सही मार्गदर्शन देना ही उसका दायित्व होता है। परमगुरू का स्थान महागुरू से अलग होता है। वह विद्यार्थी के विषय को बदलकर उसकी भावना को समझ आगे पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ा उसे अपने आप सीखने की प्रेरणा देता है और रास्ते को कठिन बना उसको हल करने की शिक्षा देता है। उसकी अपनी विलक्षण क्षमता से साक्षात्कार करा, अपने आपकी खूबियों से मिलाता है।हर व्यक्ति में कुछ विलक्षण प्रतिभायें होती है, उसे बता कर आगे बढ़ा समाज में सही व्यक्ति को सही मार्गदर्शन कर, व्यक्ति व समाज का हित कराता है। साथ ही अपने आपको तृप्त अवस्था में रख किसी भी वस्तु या व्यक्ति विशेष की कृपा की चाह नहीं रखता है। उसका उद्देश्य ही उसका सर्वस्व होता है। ब्रह्मगुरू आज की दुनिया में एक कल्पना हो सकती है। वह गुरू जो सर्वज्ञान का भण्डार हो पर सांसारिक, भौतिक विधाओं से अलग आध्यात्मिक वातावरण में विचरता हो। अपने आत्म बल व आध्यात्मिक बोध से अपने आपको बखूबी समझ दूसरों को आवश्यक शिक्षा तभी देता है जब वह उसका हकदार होता है। विलक्षण बुद्धि से दूसरों की मनोभावना जान विद्यार्थी को पहचान उसको सही विकास की दिशा देना ही इनका मनोरथ होता है। शिष्य को उसकी बौद्धिक स्थिति से साक्षात कर उसकी मानसिक स्थिति को ऐसी स्थिति में लाता है जब वह सम मनोभाव में जाकर ज्ञान को प्राप्त करता है। आज भी ऐसे ब्रह्मगुरू हर क्षेत्र, व हर देश में मिलते है। उनके अनुयायी ही उन्हें समझते है। उनकी व्याख्या करना मुश्किल है। ज्ञान पुँज है। मार्गदर्शक है। जिन्दगी की हर राह पर आपके साथ खड़े रहते हैं। आवश्यकता है आपको उस स्तर पर लाकर उसे समझने की।
अंत में गुरू घण्टाल। गुरू रूप में घंटा बजाने वाला। अपने आपकी स्तुति ही उसका कार्य होता है और अहसान बताना ही उसका धर्म होता है। यह अध्यापक अवश्य होते हैं पर अध्यापक का दायित्व नहीं निभाते हैं। अध्ययन कार्य को एक व्यापार बना दिया है और सभी तरह के व्यापारिक हथकण्डे अपना विद्यार्थियों को आकर्षित कर पैसा कमाना है। विद्यार्थी के हित या उसकी भलाई से उनका कोई भी वास्ता नहीं रहता। कई शहरों में कई बालक खुदकुशी का शिकार हो रहे हैं, क्योंकि इस कोमल हृदय की भावना समझने वाला और समझाने वाला कोई नहीं होता। यह व्यक्ति अध्यापक की श्रेणी में आ सकता है लेकिन गुरू की श्रेणी में गुरू घण्टाल ही कहलायेगा। मित्रों, एक गुरू आप सबमें बस रहा है। आप अपने कार्य में विभिन्न व्यक्तियों से मिल उन्हें मार्गदर्शन देते होंगे। इन भावों में अपनापन व व्यक्ति के मनोभाव का संयोजन कर एक नई क्रिया को जन्म दे सकते हैं और वातावरण को खुशनुमा बना, व्यक्ति को निखारकर अपने क्षेत्र में सफलता के नये आयाम स्थापित कर सकते हैं। व्यक्ति व समाज को आज इसी की आवश्यकता है। गुरू का भाव, अंतरंग पहचान, सबका साथ, मिल कर सबके हित के कार्य एवं आगे बढ़ कर सही नेतृत्व देना एक सफल समाज की पहचान है और यही गुरू का सही आशीर्वाद है। आप अपने अंदर इस अपने गुरू को पहचानिये और जागृत करियें। आपको आत्म तृप्ति और आत्म सुख का स्वयं ज्ञान होगा। अपने व्यक्तित्व एवं भाषा से दूसरों का सही मार्गदर्शन कर परिवार एवं समाज को खुशहाल बना सकेंगे। आप सभी को आपकी अंतःचेतना एवं नवजीवन की जागृति पर बधाई एवं ईश कृपा आपको गुरू का एहसास कर जिन्दगी में हमेशा सफलता के नये आयाम दे, यही प्रार्थना है।

